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Saturday, April 30, 2022

साझेदारी संलेख क्या है? साझेदारी संलेख का महत्व एवं मुख्य बातें।

साझेदारी संलेख क्या है? साझेदारी संलेख का महत्व एवं मुख्य बातें | Sajhedari sanlekh ka arth |Meaning of Partnership Deed in Hindi.



#साझेदारी संलेख का अर्थ (Meaning of Partnership Deed)


साझेदारी संलेख फर्म के साझेदारों द्वारा किया गया समझौता है, जिसमें साझेदारों के पारस्परिक अधिकार, कर्तव्य एवं दायित्व का उल्लेख तथा व्यवसाय को चलाने की शर्तों एवं नियमों को लिखा जाता है। इसे 'साझेदारी समझौता,' 'साझेदारी अन्तर्नियम', 'साझेदारी संविदा', अथवा 'साझेदारी विधान' भी कहा जाता है।

#साझेदारी संलेख की आवश्यकता (Necessity of Partnership Deed)


भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 के अनुसार साझेदारी की स्थापना करने के लिए साझेदारों के बीच अनुबन्ध, ठहराव अथवा समझौता होना चाहिए। यह समझौता मौखिक हो सकता है अथवा लिखित इस प्रकार साझेदारी का पंजीयन ऐच्छिक होता है। परन्तु व्यापार की भलाई के लिए एवं कार्य को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए यह आवश्यक तथा उचित होगा कि समझौता लिखित हो 

साझेदारी संलेख की आवश्यकता को निम्न बिन्दुओं से जाना जा सकता है :

(i) भविष्य के आपसी मतभेदों के निवारण के लिए समझाते का होना आवश्यक है।

(ii) इसकी सहायता से भविष्य में व्यापार में होने वाले आपसी मतभेदों एवं झगड़ों को आसानी से निपटाया जा सकता है।

(ii) इसके अनुसार प्रत्येक साझेदार के पारस्परिक अधिकारों और कर्तव्यों की सीमा पहले ही निश्चित हो जाती है। 

(iv) इसके अतिरिक्त फर्म के कार्य संचालन और व्यवस्था में भी सुगमता होती है।

#साझेदारी संलेख की मुख्य बातें (Main Terms of Partnership Deed)


माझेदारी संलेख में क्या लिखा जाये, यह फर्म की प्रकृति एवं साझेदारों के बीच तय हुई शर्तों पर निर्भर करता है। साझेदार अपने व्यापार को अच्छे प्रकार से चलाने के लिए इस संलेख या समझौते में निम्नलिखित बातों का उल्लेख करते हैं :

1. फर्म का नाम व पता- सर्वप्रथम संलेख में फर्म का नाम दिया जाता है। साझेदार अपनी फर्म का जो चाहे नाम रख सकते हैं, किन्तु नाम ऐसा नहीं होना चाहिए, जो किसी अन्य फर्म से मिलता-जुलता हो तथा उस नाम से किसी को धोखा होता हो। फर्म के नाम के साथ कोई ऐसा शब्द भी नहीं होना चाहिए, जिसमे केन्द्रीय अथवा प्रान्तीय सरकार का समर्थन या सहयोग प्रकट होता हो। 

2. व्यापार का क्षेत्र व स्वरूप - फर्म किन वस्तुओं का व्यापार कहाँ-कहाँ करना चाहती है, इसका स्पष्ट उल्लेख साझेदारी संलेख में किया जाता है। व्यापार का क्षेत्र क्या होगा ? यह स्थानीय, राज्यीय अन्तर्राज्यीय या अन्तर्राष्ट्रीय होगा, इसका स्पष्ट उल्लेख संलेख में किया जाता है।

3. साझेदारों के नाम व पते- साझेदारी संलेख में फर्म के सभी साझेदारों के नाम व पूरे पते स्पष्ट रूप से लिखे जाते हैं। 

4. साझेदारी की अवधि व प्रारम्भ- संलेख में इस बात का भी स्पष्ट उल्लेख होता है कि फर्म किस तिथि से एवं कितनी अवधि के लिए बनाई गई है। निश्चित अवधि के अभाव में साझेदारी इच्छानुसार कभी भी भंग की जा सकती है।

5. साझेदारों के कर्तव्य तथा अधिकार- समस्त साझेदारों के क्या-क्या कर्तव्य एवं अधिकार रहेंगे? इसका उल्लेख भी संलेख में किया जाता है, जिससे साझेदारों के कर्तव्य एवं अधिकारों का ज्ञान होता है।

6. साझेदारों की पूंजी- कौन साझेदार कितनी पूंजी किस रूप में लगाएगा और किस दर से ब्याज दिया जायेगा ? इसका स्पष्टीकरण भी संलेख में होना चाहिए। ब्याज के सम्बन्ध में यदि कोई उल्लेख न हो, तो साझेदारों को उनकी पूँजी पर ब्याज नहीं दिया जाता है। यदि साझेदारी व्यवसाय में हानि हो तो पूँजी पर ब्याज दर का उल्लेख होने पर भी ब्याज नहीं दिया जाता है।

7. साझेदारों द्वारा ऋण देना- यदि साझेदार फर्म को ऋण देते हैं, तो उन्हें किस दर से ब्याज दिया जायेगा और यह ऋण की राशि कितनी अवधि में किस तरीके से चुकाई जायेगी, आदि बातें संलेख में लिखी जाती हैं। 

8. साझेदार द्वारा ऋण लेना- क्या फर्म के साझेदार फर्म से ऋण ले सकेंगे ? ऋण की क्या सीमा होगी ? ऋण पर कितना ब्याज लगाया जावेगा तथा ऋण के भुगतान की क्या शर्तें होंगी, आदि बातें स्पष्ट होनी चाहिए। 

9. साझेदारों द्वारा आहरण- संलेख में यह भी लिखा जाता है, क्या फर्म के साझेदार निजी कार्य के लिए फर्म से रुपया ले सकते हैं? यदि आहरण करना तय है, तो उसकी रकम, अवधि एवं ब्याज की दर भी स्पष्टतया लिख दी जाती है।

10. लाभ तथा हानि का विभाजन- साझेदारों के बीच लाभ तथा हानि का विभाजन किस प्रकार होगा ? यह अनिवार्य नहीं है कि जिस अनुपात में उन्होंने पूँजी लगाई हो, उसी अनुपात में लाभ-हानि का विभाजन हो। अतः लाभ-हानि विभाजन का तरीका संलेख में अवश्य होना चाहिए। इसके अभाव में लाभ-हानि का विभाजन समान अनुपात में होता है।

11. साझेदारों का कमीशन एवं वेतन- यदि किसी साझेदार को उसके अधिक कार्य करने के परिणामस्वरूप किसी भी प्रकार का कोई वेतन अथवा कमीशन दिया जाना हो, तो उसका उल्लेख भी संलेख में कर दिया जाता है, अन्यथा साझेदार को कमीशन या वेतन पाने का अधिकार नहीं होता है। 

12. खाते तथा उनका अंकेक्षण- फर्म के हिसाब किस प्रकार रखे जायेंगे, उन पर किनके हस्ताक्षर होंगे तथा हिसाब के अंकेक्षण की क्या रीति होगी, इन सब बातों का पूरा विवरण संलेख में होता है।

13. साझेदारों का प्रवेश- फर्म में यदि किसी नये साझेदार को प्रवेश देना हो, तो उसके नियम भी साझेदारी संलेख में स्पष्ट कर दिये जाते हैं।

14. साझेदारों की निवृत्ति- यदि कोई साझेदार हमेशा के लिए अवकाश प्राप्त करना चाहता है या निवृत्त होना चाहता है, तो निवृत्ति पर उसके अधिकार एवं दायित्व क्या रहेंगे? यह भी स्पष्ट कर दिया जाता है।

15. साझेदारी के नियमों का उल्लंघन- साझेदार द्वारा नियम एवं शर्तों का उल्लंघन करने पर उसके विरुद्ध क्या कार्यवाही की जायेगी ? इसका भी स्पष्ट विवरण संलेख में किया जाता है। 

16. साझेदारी का अन्त साझेदारी व्यवसाय का अन्त या समापन किन-किन परिस्थितियों में किया जा सकता है ? इसका भी स्पष्ट विवरण संलेख में होना चाहिए। इसके अतिरिक्त फर्म की समाप्ति पर उसकी सम्पत्ति के बँटवारे का तरीका भी लिख दिया जाता है। 

17. व्यापारिक साख- साझेदारी संलेख में व्यापार की ख्याति के मूल्यांकन की विधि का भी उल्लेख होता है। ख्याति के मूल्यांकन की आवश्यकता उस समय होती है, जब कोई साझेदार प्रवेश लेता है, निवृत्त होता है या फर्म को बेच दिया जाता है।

18. गार्नर बनाम मरें का नियम- किसी साझेदार के दिवालिया हो जाने पर गार्नर बनाम मेरे का नियम लागू होगा या नहीं। यद्यपि भारतीय साझेदारी अधिनियम 1932 के अनुसार भारत में यह नियम लागू नहीं होता है।

19. साझेदार की मृत्यु तथा उसके उत्तराधिकारी को भुगतान करना- यदि किसी साझेदार की मृत्यु हो जाती है, तो उसकी व्यापार में लगी हुई पूंजी तथा सम्पत्ति का भुगतान उसके उत्तराधिकारी को किया जाता है। यदि इस राशि को व्यापार में ही रखना हो तथा उत्तराधिकारी को साझेदारी के अधिकार दिये जाने हों, तो संलेख में पहले से ही स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए। यदि मृतक की राशि को किश्तों में दिया जाये, तो उस पर ब्याज देने की क्या व्यवस्था होगी ?

20. बीमा का विभाजन- यदि फर्म के साझेदारों का बीमा करा दिया गया है, तो बीमा कम्पनी से पाप्त रकम का अधिकारी कौन होगा ? इसका स्पष्टीकरण भी संलेख में होना चाहिए। 

21. चैक पर हस्ताक्षर करने का अधिकार- साझेदारी फर्म में अनेक साझेदार होते हैं। अतः ऐसी स्थिति में चैक पर कौन साझेदार हस्ताक्षर करेगा ? इसका स्पष्ट उल्लेख भी संलेख में होना आवश्यक है। 

22. पंच फैसला- साझेदारों के मध्य भविष्य में होने वाले आपसी मतभेद एवं झगड़ों को निपटाने के लिए पंच या मध्यस्थ की नियुक्ति होगी अथवा नहीं। यदि हाँ, तो नियुक्त मध्यस्थ के क्या कर्तव्य और अधिकार होंगे? इसका भी उल्लेख साझेदारी संलेख में होना आवश्यक है ?

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