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Friday, May 27, 2022

ख्याति किसे कहते है? ख्याति की विशेषताएँ, परिभाषा एवं उत्पन्न होने के कारण।

ख्याति (Goodwill) किसे कहते है? ख्याति की विशेषताएँ, परिभाषा एवं उत्पन्न होने के कारण।



#ख्याति से आशय एवं परिभाषा 

(Meaning and Definition of Goodwill) 

सामान्य लाभ से अधिक लाभ अर्जित करने की क्षमता को ही 'ख्याति' कहते हैं।
ख्याति ऐसे व्यापार में उत्पन्न होती है, जो लगाई गई पूंजी पर लाभ की सामान्य दर से अधिक लाभ अर्जित करता है। अधिक (अतिरिक्त) लाभ अर्जित करने की क्षमता व्यवसाय के नाम, उज्ज्वल भविष्य लोकप्रियता तथा व्यापारी के व्यावसायिक सम्बन्ध, चरित्र, ईमानदारी व परिश्रम से प्राप्त होती है। इस कारण व्यापार की बिक्री में वृद्धि होती है, जिससे व्यापार की लाभार्जन शक्ति बढ़ जाती है। भवन, यंत्र, फर्नीचर की भांति इसका कोई भौतिक स्वरूप नहीं होता है। यह अमूर्त संपत्ति है।


#ख्याति की परिभाषा


विद्वान लेखकों द्वारा दी गई प्रमुख परिभाषायें निम्नलिखित हैं

1. लार्ड मेकनाटन- "ख्याति एक ऐसी वस्तु है, जिसका वर्णन करना सरल है, किन्तु परिभाषित करना कठिन है। यह व्यापार के अच्छे नाम, प्रतिष्ठा और सम्बन्धों से मिलने वाला लाभ है। यह वह आकर्षण शक्ति है, जो ग्राहकों को अपनी ओर खींचती है। ख्याति अनेक तत्वों से मिलकर बनती है।"

2. लार्ड एल्डन- “ख्याति इस सम्भावना के अतिरिक्त और कुछ नहीं है कि पुराने ग्राहक पुराने स्थान को ही चुनेंगे।" 3. प्रो. डिक्सी- "जब कोई व्यक्ति ख्याति की राशि देता है, तो वह राशि इसलिये देता है, जो उसे ऐसी स्थिति में पहुंचा देती है कि वह इतनी अधिक आय प्राप्त करेगा, जितनी कि वह स्वयं के प्रयत्नों से प्राप्त नहीं कर सकता था।" 

#ख्याति के लक्षण (Characteristics of Goodwill)

ख्याति की उपर्युक्त व्याख्या के आधार पर इसके निम्नलिखित लक्षण स्पष्ट किये जा सकते हैं -

(1) यह समृद्ध व्यापार की सम्पत्ति है।

(2) यह अमूर्त और अदृश्य सम्पत्ति है।

(3) यह एक विक्रय योग्य सम्पत्ति है।

(4) इसका मूल्य घटता-बढ़ता रहता है।

(5) यह अधिक लाभ अर्जित करने में सहायक होती है।

(6) यह व्यापार की पूंजी का अभिन्न अंग है। 

(7) अमूर्त सम्पत्ति होने के कारण इसे अपलिखित किया जाता है।

(8) यह कई तत्वों से मिलकर बनती है।


#ख्याति उत्पन्न होने के कारणा (Causes of Origin of Goodwill) 

ख्याति अनेक तत्वों से मिलकर बनती है। एक समृद्ध और प्रतिष्ठित व्यापार जिन तत्वों के कारण ख्याति अर्जित करता है, उनमें प्रमुख तत्व निम्नलिखित हैं :

1. व्यापार की स्थिति- यदि व्यापार की स्थिति ऐसे स्थान पर हो कि ग्राहकों को आने में पूर्ण  सुविधा हो, तो ऐसा व्यापार ख्याति प्राप्त कर लेता है। 

2. उत्तम माल और उचित दाम ग्राहकों को उचित मूल्य पर उत्तम माल उपलब्ध कराने पर भी व्यापार अपनी ख्याति बना लेता है।

3. व्यापारी का सद्व्यवहार व्यापारी के व्यक्तिगत गुण, जैसे- नैतिकता, सत्यनिष्ठा, ईमानदारी, मधुर व्यवहार आदि भी व्यापार की लाभार्जन शक्ति बढ़ाते हैं। 

4. व्यापार के प्रति ग्राहकों का आकर्षण- ग्राहकों का व्यापार के प्रति आकर्षण भी व्यापार की ख्याति प्रदान करता है। ग्राहकों को आकर्षित करने के लिये अनेक प्रकार के साधन हैं, जैसे- विज्ञापन, इनामी योजना तथा ग्राहकों को सुविधाएँ प्रदान करना आदि।

5. सर्वाधिकार प्राप्त होना व्यापार में एकाधिकार, ट्रेडमार्क आदि से ख्याति उत्पन्न हो जाती है। 

6. विक्रय एवं वितरण की उत्तम व्यवस्था यदि व्यापार ने विक्रय एवं वितरण हेतु नियोजित व्यवस्था अपना रखी है, तो ग्राहक सुविधा का अनुभव करता है, जिससे ख्याति शीघ्र स्थापित हो जाती है। 

7. कार्यकुशल एवं कर्तव्यनिष्ठ कर्मचारी- यदि संस्थान में कार्यरत कर्मचारी अपने कार्यों में कुशल एवं कर्तव्यनिष्ठ हैं तथा स्वयं को व्यापार का एक अंग महसूस करते हैं, तो वे ग्राहकों को संतुष्ट रखने में सफल रहते हैं। ऐसा व्यापार अपनी साख जमाने में सफल रहता है।

Sunday, May 22, 2022

आय व्यय खाता किसे कहते है? आय व्यय खाते की विशेषताएँ ।

आय व्यय खाता किसे कहते है?(Income and Expenditure Account)| आय व्यय खाते की विशेषताएँ ।

आय व्यय खाते का अर्थ एवं आवश्यकता 
(Meaning and Need)


इस को बनाने का उद्देश्य एक अवधि विशेष से सम्बन्धित आय-व्यय का परिणाम ज्ञात करना है। जिस प्रकार व्यापारिक संस्थाएं लाभ अथवा हानि जानने के लिए लाभ-हानि खाता बनाती है, उसी प्रकार लाभ न कमाने वाली या गैर-व्यापारिक संस्थाएँ तथा व्यावसायिक व्यक्ति अपना वार्षिक परिणाम जानने के लिए आय-व्यय खाता तैयार करते हैं। आय व्यय खाता एक नाममात्र का खाता है।

आय व्यय खाते की परिभाषा (Definitions) 


1. श्री एन. एस. डावर के अनुसार, आय-व्यय खाता वास्तव में लाभ-हानि खाता है, किन्तु जैसे कि गैर-व्यापारिक संस्थाओं से लाभ अथवा हानि दशनि की अपेक्षा नहीं की जाती है, इसको आय-व्यय खाते की संज्ञा दी गई है। 

 2. श्री बॉटलीबॉय के अनुसार, यह एक आयगत खाता है, जो कि गैर-व्यापारिक संस्थाओं द्वारा बनाया जाता है जैसे कि शिक्षण संस्थाएं, अस्पताल आदि और एक निश्चित अवधि में अर्जित समस्त आय को सम्मिलित करता है।

आय-व्यय खाते की विशेषताएं
(Features of Income and Expenditure A/c) 
        या
आय-व्यय खाता बनाने की विधि
(Method of Preparing Income and Expenditure A/c) 


आय-व्यय खाता बनाने की विधि लाभ-हानि खाते के समान ही है। अतः इस खाते के नाम पक्ष में समस्त व्यय और जमा पक्ष में समस्त आय लिखी जाती हैं। यह आय-व्यय उसी वर्ष से सम्बन्धित होना चाहिए, जिस वर्ष का आय-व्यय खाता तैयार करना है। यदि इस खाते के जमा पक्ष का योग नाम पक्ष से अधिक होता है, तो अन्तर आय का व्यय पर आधिक्य (Excess of Income over Expenditure) कहलाता है। इसके विपरीत नाम पक्ष का आधिक्य व्यय का आय पर आधिक्य (Excess of Expnditure over Income) कहलाता है। संक्षेप में, इन्हें क्रमशः बचत (Surplus) तथा घाटा (Deficiency) भी कहते हैं। यह खाता प्राप्ति भुगतान खाते के आधार पर बनाया जाता है। यह नाममात्र का खाता होता है। 

आय-व्यय खाता बनाते समय निम्नलिखित बातें ध्यान में रखनी चाहिए:

(1) सर्वप्रथम संस्था का नाम, खाते का नाम (आय-व्यय खाता) एवं हिसाबी वर्ष का उल्लेख शीर्षक के रूप में करना चाहिए।

(2) प्राप्ति एवं भुगतान खाते में दिए गए प्रारंभिक और अंतिम रोकड़ शेष तथा बैंक शेष का लेखा नहीं करना चाहिए।

(3) इसमें समस्त व्यय नाम पक्ष में और आय जमा पक्ष में लिखी जाती है।

(4) एक अवधि विशेष से सम्बन्धित समस्त आय तथा व्यय, चाहे उनकी प्राप्ति या भुगतान न हुआ हो, इसमें लिखे जाते हैं। 

(5) इसमें पूँजीगत व्यय तथा पूँजीगत प्राप्ति का लेखा नहीं होता है।

(6) इसमें पूर्वदत्त तथा अदत्त व्यय का समायोजन किया जाता है। 

(7) इस खाते में उपार्जित एवं अनुपार्जित आय सम्बन्धी समायोजन किये जाते हैं।

(8) इसमें सम्पत्ति का हास तथा अशोध्य ऋणार्थ संचिति का समायोजन किया जाता है।

(9) इसमें रोकड़ शेष तथा सम्पत्ति नहीं दिखाई जाती है। 

(10) इसके साथ चिट्ठा बनाना अनिवार्य है।

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Tuesday, May 17, 2022

What is Debenture? | Characteristics and Utility of Debenture.

What is Debenture? | Characteristics and Utility of Debenture. 

#Debenture Meaning



Debenture is a contract between the lender and the company, under which the company promises to pay the loan taken from the lender along with interest. It contains all the terms and conditions of the loan. 

The word Debenture is derived from the Latin word 'Debere', which means to owe. When a company needs long-term credit for business, it receives money from the public by issuing debentures.

#Debenture Definitions

Definition of Debenture According to Section 2 (30) of the Indian Companies Act, 2013, “Debentures include debentures, bonds, and other securities of the company, whether or not they carry a charge on the property of the company.” 


2. In the words of Naidu and Datta, “A debenture is a form of debenture issued under the common seal of the company which borrows loans and explains the conditions subject to which they are issued and are to be rectified.”


Ideal Definition - "Debenture is a written acknowledgement of debt, on which the company's common seal is printed and in which it is agreed to pay interest at a fixed rate till the principal is paid on a specified date."


#Debenture Characteristics or features 

The salient features of debentures are as follows 

1. Proof of Loan - Debenture is a document/evidence of the loan taken by the company. 2. Fixed rate of interest- Debentures are issued at a fixed rate of interest. 

3. Contract of return - The debenture contains an explanation of the period after which the principal amount is to be paid. 

4. Charges on Assets- Debentures often have their own floating charge on the assets of the company, so they are safe.

5. Long Term Debentures- Debt taken by debentures is of long term nature. 

6. Marking of the common seal- The common seal of the company is printed on each debenture. 

7. Details- Debentures contain all the details, such as period, rate of interest, time of return, type etc. 

8. Period of Interest -Payment Interest on debentures is paid every 6 months. Interest is payable on the debentures, whether profit or loss to the company.

#Status of debentureholders 

In fact, the debenture holders are the creditors of the company. They compulsorily get the loan given by them through debentures and the interest on it. Whether the company is profitable or not. If the company is not able to pay the same under the terms of the issue, the debenture holders can recover their debt by presenting them in court later. They do not have the right to participate in the management and control of the company.

#Debentures Utility or Advantages.

The utility or benefits of debentures can be stated as follows: 

1. Fulfillment of financial needs- If the company needs capital even after the issue of shares, then the company gets the required amount by issuing debentures. 

2. No ownership- Debenture holders do not get voting rights because they do not have ownership of the company.

3. Having a fixed rate of interest - On fixed income debentures lets the company know how much interest it will have to pay and how much interest the debenture holder will continue to earn.

4. Benefit to the Shareholders - After the interest is available on the loan at a low rate of interest, the shareholders get sufficient dividend. 

5. Redemption facility - Redemption of debentures is done when sufficient funds are available with the company. 

6. Security to debenture holders – The assets of the company are in the form of floating charges, so the loan given by it remains safe in case of loss or liquidation. 

7. Free from forfeiture - In case of non-payment of calls, debentures cannot be forfeited.







Friday, May 13, 2022

साझेदारों के पूँजी खाते (Capital Account of Partners) | साझेदारों के पूँजी खाते बनाने की पध्दतियाँ।

साझेदारों के पूँजी खाते (Capital Account of Partners) | साझेदारों के पूँजी खाते बनाने की पध्दतियाँ। स्थाई पूँजी पध्दति एवं परिवर्तनशील पूँजी पद्धति।

साझेदारो के पूँजी खाते (Capital Accounts of Partners)


एक साझेदारी फर्म में एक से अधिक स्वामी होते हैं, इसलिए प्रत्येक साझेदार के नाम से उतने ही पूँजी खाते रखे जाते हैं, जितने साझेदार होते हैं। 

पूँजी खाते बनाने की पध्दतियाँ


यह पूँजी खाते साझेदारों के परस्पर समझौते के अनुसार स्थायी पूँजी पद्धति अथवा परिवर्तनशील पूँजी पद्धति पर रखे जाते हैं। साझेदारी समझौते में पूँजी खाता रखने की पद्धति का उल्लेख कर दिया जाता है। उल्लिखित पद्धति के अनुसार ही साझेदारों के पूंजी खाते बनाये जाने चाहिए:

[1] स्थायी पूँजी (Fixed Capital) - स्थायी पूँजी का तात्पर्य उस पूँजी से है, जिसमें किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं होता है। साझेदारी व्यवसाय प्रारम्भ करते समय साझेदार जो रकम अथवा सम्पत्ति व्यापार में लगाते हैं, वह उनकी पूँजी होती है। यदि वह पूँजी सदैव एक समान रखी जाये, तो इसे स्थायी पूँजी कहा जायेगा। स्थायी पूँजी होने पर साझेदारों के आहरण, लाभ-हानि, पूँजी व आहरण का ब्याज तथा वेतन आदि का लेखा पूँजी खाते में नहीं किया जाता है। हाँ, यदि साझेदार आपस में निश्चय कर पूँजी की मात्रा बढ़ाना चाहें, तो पूँजी के लिए लायी जाने वाली अतिरिक्त राशि का लेखा पूँजी खाते में ही किया जाता है।

स्थायी पूँजी होने पर प्रत्येक साझेदार के दो खाते रखे जाते हैं 

1).  पूँजी खाता (Capital Account)- इस खाते में साझेदार की स्थायी पूँजी दिखाई जाती है, जो हमेशा एक समान रहती है।

Partners capital account
Partners Capital account.














2). चालू खाता (Current Account)- जब साझेदारों के पूँजी खाते स्थायी पद्धति पर रखे जाते हैं, तब प्रत्येक साझेदार के लिए एक विशेष खाता और रखा जाता है, जिसे साझेदार का चालू खाता (Partner's Current A/c) कहते हैं। इस खाते में साझेदार का आहरण, आहरण का ब्याज तथा हानि का भाग नाम लिखा जाता है और पूंजी का ब्याज, शुद्ध लाभ का भाग, वेतन आदि जमा लिखे जाते हैं। इस खाते का शेष नाम अथवा जमा कोई भी हो सकता है। यह खाता चिट्ठे में पृथक से दर्शाया जाता है। कभी-कभी साझेदारों के आहरण के लिए पृथक से आहरण खाता (Drawings Account) भी रखा जाता है। वर्ष के अन्त में इसका शेष चालू खाते में स्थानान्तरित कर दिया जाता है।

Partners Current Account
Partners Current Account




(2)  परिवर्तनशील पूँजी (Fluctuating Capital)- यह वह पूँजी है, जिसमें प्रतिवर्ष परिवर्तन होता रहता है। यह परिवर्तन पूंजी पर ब्याज, साझेदार के वेतन व उसे मिलने वाले लाभांश, आहरण व आहरण के ब्याज के कारण होता है। यदि साझेदार परिवर्तनशील पूँजी खाते रखने का निश्चय करते हैं, तो व्यवसाय में साझेदारों का केवल पूँजी खाता ही रखा जाता है। आहरण व आहरण का व्याज तथा व्यापार की हानि पूँजी खाते में नाम और पूँजी का ब्याज, वेतन तथा लाभांश इसमें जमा किये जाते हैं। ऐसा करने से प्रत्येक वर्ष के अन्त में साझेदारों के पूंजी खातों का शेष घट-बढ़ जाता है।


Partners Capital Account
Fluctuating capital Method


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