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Tuesday, October 19, 2021

लेखांकन की आधारभूत अथवा मूलभूत मान्यताएँ

लेखांकन की आधारभूत अथवा मूलभूत मान्यताएँ।

लेखांकन की आधारभूत अथवा मूलभूत मान्यताएँ (Basic Assumptions of Accounting)

लेखांकन की आधारभूत अथवा मूलभूत मान्यताएँ



लेखांकन की मूलभूत मान्यताएँ लेखांकन प्रक्रिया की नींव का कार्य करती हैं। कोई भी संस्था इन मूलभूत अर्थात् आधारभूत मान्यताओं का पालन किए बिना अपने वित्तीय विवरण नहीं बना सकती है।

प्रमुख रूप से लेखांकन की चार मूलभूत मान्यताएँ हैं, जो कि निम्नानुसार हैं 
(A) लेखांकन अस्तित्व की मान्यता (Assumption of Accounting Entity)
[B] मौद्रिक मापन की मान्यता (Assumption of Monetary Measurement) 
[C] चालू व्यवसाय की मान्यता (Assumption of Going Concern)
[D] लेखांकन अवधि की मान्यता (Assumption of Accounting Period) मूलभूत मान्यताओं को निम्न वर्णन से समझा जा सकता है

1. लेखांकन अस्तित्व की मान्यता (Assumption of Accounting Entity)- इस मान्यता के अनुसार व्यवसाय की इकाई को उसके स्वामी से पृथक माना जाता है। स्वामी द्वारा व्यवसाय के साथ किए हुए लेन-देन उसी प्रकार माने जाते हैं, जैसे कि बाहरी पक्ष ने किए हों। स्वामी द्वारा व्यवसाय में लगाई गई पूँजी को दायित्व माना जाता है और उसके द्वारा व्यक्तिगत कार्यों के लिए व्यापार से निकाली गई राशि को पृथक से आहरण लेखा खोलकर लिखा जाता है। इसी मान्यता के आधार पर व्यवसाय का लाभ-हानि सही-सही निकलता है। पृथक इकाई (Separate Entity) या लेखांकन अस्तित्व की मान्यता सभी प्रकार के व्यवसायों में है, चाहे वह एकाकी व्यापार हो, साझेदारी संस्था हो अथवा कम्पनी संगठन ।

2. मौद्रिक मापन की मान्यता (Assumption of Monetary Measurement)- इस मान्यता के अन्तर्गत लेखा पुस्तकों में केवल ऐसी घटनाएँ तथा लेन-देन ही लिखे जाते हैं, निश्चित रूप से मुद्रा (Money) में प्रकट किये जा सकते हैं। व्यवसाय में पायी जाने वाली समस्त सम्पत्तियाँ जैसे- भूमि, भवन, स्टॉक, विनियोग आदि के मूल्य को मौद्रिक इकाई के द्वारा ही व्यक्त किया जाता है। प्रत्येक देश मूल्य को अपने देश की मुद्रा में ही व्यक्त करते हैं। जैसे भारत में इन मर्दों का मूल्य रुपयों में व्यक्त किया जाएगा तो अमेरिका में डॉलर में तथा इंग्लैण्ड में पौण्ड में। लेखांकन का उद्देश्य सौदों का लेखा पुस्तकों में करने के साथ ही आर्थिक स्थिति की जानकारी एवं करारोपण हेतु शासन को सामयिक रिपोर्ट भेजना भी है, जिनकी माप मुद्रा में की जाती है। यदि मापा हुआ प्रतिफल मुद्रा में न हो तो लेखांकन का कोई उपयोग नहीं रहेगा। मुद्रा में मापा हुआ प्रतिफल ही लेखांकन की विषय-सामग्री होती है।

3. चालू व्यवसाय की मान्यता (Assumption of Going Concern)- इस मान्यता के अनुसार यह मान लिया जाता है कि व्यवसाय भविष्य में निरन्तर चलता रहेगा और बन्द नहीं होगा। इसके आधार पर लेखापाल व्यवसाय के माल एवं सम्पत्ति के मूल्यों को बाजार मूल्य पर मूल्यांकित नहीं करता है। सम्पत्तियों पर हास की गणना इनके बाजार मूल्य पर आधारित न होकर अनुमानित जीवनकाल पर आधारित होती है। साथ ही वर्ष के अन्त में बनाये जाने वाले अन्तिम खाते (Final Accounts) में अदत्त व्ययों, पूर्वदत्त व्ययों, उपार्जित आय तथा अनुपार्जित आय आदि समायोजनों का भी लेखा किया जाता है, क्योंकि लेखापाल यह जानता है कि व्यवसाय भविष्य में चालू रहेगा और ये समायोजन भविष्य में समायोजित कर लिए जावेंगे। वह व्यवसाय बन्द होने की सम्भावना के आधार पर लेखे करना बन्द नहीं करता।

4. लेखांकन अवधि की मान्यता (Assumption of Accounting Period)- इस मान्यता के अनुसार निरन्तर चलने वाले व्यवसाय के लिए वार्षिक लेखे तैयार करना चाहिए। यदि अवधि की मान्यता को ध्यान नहीं रखा जाये तो व्यवसाय के लाभालाभ का ज्ञान नहीं हो पाएगा। संक्षिप्त अवधि के व्यवसायों के लिए उनकी जीवन अवधि ही लेखा अवधि मानी जाती है। जैसे-प्रदर्शनियों अथवा मेलों में लगाये गये व्यवसाय या मौसमी व्यवसाय ।

सामान्यतया यह अवधि एक वर्ष होती है, किन्तु अवधि का निर्धारण व्यवसाय की प्रकृति के आधार पर एवं व्यवसाय के स्वामी के लेखांकन सम्बन्धी उद्देश्यों के आधार पर किया जाता है। अवधि की मान्यता के आधार पर एक अवधि विशेष के व्यवसाय की प्रगति एवं वित्तीय स्थिति की तुलना दूसरे अवधि विशेष की वित्तीय स्थिति से की जा सकती है। व्यवसाय की लागत, व्यावसायिक कार्यक्षमता तथा व्यावसायिक लाभ की वार्षिक तुलना के आधार पर व्यवसाय सम्बन्धी विभिन्न योजनाएँ बनायी जा सकती हैं। इन्हीं कारणों से लेखांकन अवधि की मान्यता महत्वपूर्ण मानी गई है।

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