लेखांकन के सिद्धांत का अर्थ | लेखांकन के सिद्धांत की विशेषताएं
लेखांकन के सिद्धांत अर्थ/आशय
लेखांकन के सिद्धांत वे नियम हैं, जिनका उपयोग करके एक लेखापाल व्यापार के वित्तीय विवरण एवं लेखों को तैयार करता है। लेखांकन सिद्धांत के दिशा-निर्देश होते हैं, जिनकी सहायता से लेखाकर्म को अधिक व्यावहारिक एवं सर्वमान्य बनाया जाता है।
लेखांकन कार्य को सुचारू रूप से सम्पन्न कर उसे वैश्विक रूप में सर्वमान्य बनाने के लिए लेखांकन के सिद्धांतों का पालन करना अनिवार्य होता है। यद्यपि इन सिद्धांतों को शासन ने किसी अधिनियम द्वारा नहीं बनाया है और न ही ये वैज्ञानिक नियम हैं, अपितु इन्हें अपनाकर लेखांकन की विधियों में एकरूपता स्थापित की जाती है। इन सिद्धांतों के आधार पर सभी लेखापाल सामान्यतः एक निर्धारित नीति का अनुसरण करते हैं, जिससे वित्तीय विवरण परस्पर तुलनीय होते. हैं और विश्लेषण हेतु एक समान आधार प्रदान करते हैं। ये सिद्धांत पूरे विश्व की लेखांकन पद्धति में एकरूपता स्थापित करते हैं।
लेखांकन के सिद्धांत परिभाषा
रॉबर्ट एन. एन्थोनी के अनुसार, "लेखाविधि के नियमों तथा प्रथाओं को सामान्यतः “सिद्धान्त"कहा जाता है"।
लेखांकन के सिद्धांत संक्षेप में
संक्षेप में, “लेखांकन सिद्धान्त वित्तीय विवरणों एवं लेखों को तैयार करने के वे नियम हैं, जिन्हें प्रयोग कर लेखांकन कार्यों को सर्वमान्यता प्रदान की जाती है।"
लेखांकन सिद्धांतों की विशेषताएँ
(Characteristics of Accounting Principles) लेखांकन सिद्धांतों में निम्न तीन विशेषताएँ होनी चाहिए:
1. तथ्यपरक (Objectivity)- लेखांकन सिद्धान्त वास्तविक तथ्यों पर आधारित होना चाहिए। ये व्यक्तिगत विचारों से परे हटकर निरपेक्ष होने चाहिए। ये सिद्धान्त विश्वसनीय होना चाहिए। प्राप्त लेखा सूचनाओं की सत्यता को परखा जा सके, ऐसा गुण भी इन सिद्धान्तों में होना चाहिए।
2. संबद्धता एवं उपयोगिता (Relevance and Usefulness) - लेखांकन सिद्धान्त में संबद्धता का गुण होना चाहिए अर्थात् लेखा सूचनाएँ तथा उससे प्राप्त परिणाम अर्थपूर्ण एवं उपयोगी होने चाहिए। जिससे इन सिद्धान्तों को सबकी मान्यता मिल सके। लेखांकन सिद्धांत में व्यावहारिकता होनी चाहिए, ताकि उसे
3. व्यावहारिकता (Feasibility)- लेखांकन सिद्धांत में व्यवहारिकता होनी चाहिए, ताकि उसे सरलतापूर्वक व्यवहार में अपनाया जा सके।


