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Saturday, March 11, 2023

MP Patwari | General Management | सामान्य प्रबंधन

MP Patwari | General Management | सामान्य प्रबंधन | प्रबंधन का आशय, विशेषताएँ, उद्देश्य, स्तर, कार्य |



प्रबंध का आशय

प्रबन्ध का सम्बन्ध उन मानवीय क्रियाओं से है, जिनका निर्देशन एवं नियंत्रण करके व्यवसाय के सामान्य उद्देश्यों की प्राप्ति की जाती है। इसका प्रमुख कार्य लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अन्य व्यक्तियों से काम लेना होता है। यह वह कला है, जिसके द्वारा व्यवसाय की निर्धारित नीतियाँ क्रियान्वित की जाती हैं।

प्रबंध की परिभाषा

प्रबन्ध के कार्यों एवं उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए अनेक विद्वानों ने प्रबन्ध की परिभाषाएँ दी हैं। कुछ प्रमुख परिभाषाएँ इस प्रकार से है-
1. विलियम एच. न्यूमैन के शब्दों में, "किसी सामान्य उद्देश्य की पूर्ति के लिए किसी व्यक्ति समूह के प्रयत्नों का मार्गदर्शन, नेतृत्व तथा नियन्त्रण ही प्रबन्ध कहलाता है।"

2. कुण्टर तथा ओ'डोनेल के शब्दों में, "औपचारिक रूप से संगठित समूहों में निहित लोगों से काम करवा लेने की कला को प्रबन्ध कहते हैं

3. ई. एफ. एल. ब्रेच के अनुसार, "प्रबन्ध किसी उद्यम की क्रियाओं का नियोजन एवं नियमन की प्रक्रिया है।

4. लारेंस एप्पले के अनुसार, "प्रबन्ध व्यक्तियों का विकास है, न कि वस्तुओं का निर्देशन । "

5. लुईस ऐलन के शब्दों में, “प्रबन्ध यही है, जो प्रबन्धक का कार्य करता है। "

6. हेनरी फेयोल के अनुसार, "प्रबन्ध से आशय पूर्वानुमान लगाना एवं योजना बनाना, आदेश देना, समन्वय करना तथा नियन्त्रण करना है।"

7. स्टेनले वेन्स के मतानुसार "प्रबन्ध निर्णय लेने तथा मानवीय क्रियाओं पर नियन्त्रण रखने की विधि है, जिससे पूर्व निश्चित उद्देश्य को प्राप्त किया जा सके। "

8. किम्बाल एवं किम्बाल के अनुसार, "व्यापक रूप से प्रबन्ध उस कला को कहते हैं, जिसके द्वारा किसी उद्योग में मनुष्यों और माल को नियन्त्रण करने के लिए आर्थिक सिद्धान्तों को व्यवहार में लाया जाये।"

9. ओलिवर शेल्डन के अनुसार, "प्रबन्ध उद्योग की वह जीवनदायिनी शक्ति है, जो संगठन को

प्रबन्ध की परिभाषाओं के आधार पर प्रबन्ध की निम्नलिखित विशेषताएं प्रकट होती हैं-

1. एक उद्देश्यपूर्ण क्रिया- प्रबन्ध का प्रमुख उद्देश्य अन्य व्यक्तियों से सुव्यवस्थित रूप से कार्य करवाकर संस्था के पूर्व निर्धारित उद्देश्यों को प्राप्त करना है। यह उद्देश्य सरल एवं स्पष्ट होने चाहिए। प्रत्येक संगठन के उद्देश्य अलग-अलग होते हैं।
2. सर्वव्यापी सिद्धान्त - प्रबन्ध के सिद्धान्तों का उपयोग व्यावसायिक या औद्योगिक क्षेत्र के साथ-साथ उन सभी क्षेत्रों में किया जाता है, जहाँ सामूहिक रूप से मिलकर काम किया जाता है। संगठन चाहे आर्थिक हो या सामाजिक या फिर राजनैतिक अथवा धार्मिक, प्रबन्ध की क्रियाएँ सभी में समान होती हैं।

3. प्रबन्ध बहुआयामी है-  प्रबन्ध बहुआयामी है। इसके मुख्य आयाम निम्न हैं-

(i) काम का प्रबन्ध (Management of Work)
(ii) लोगों का प्रबन्ध (Management of People)
(iii) परिचालन (संचालन) का प्रबन्ध (Management of Operations)

4. निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया- प्रबन्ध की प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है। यह नियोजन, संगठन, नियुक्तिकरण, निर्देशन और नियंत्रण की विभिन्न कड़ियों को जोड़कर एक श्रृंखला का रूप देता है। इन कार्यों को प्रबन्ध द्वारा साथ-साथ पूरा किया जाता है।

5. सामूहिक प्रयास- प्रबन्ध एक सामूहिक क्रिया एवं प्रयास है। इसमें व्यक्तिगत प्रयास के बजाय समूह पर बल दिया जाता है।

6. पूर्व निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति- प्रत्येक प्रबन्धकीय क्रिया के उद्देश्यों का निर्धारण प्रशासन द्वारा किया जाता है, जिसकी प्राप्ति के प्रयत्न प्रबन्ध द्वारा किये जाते हैं।

प्रबंध के स्तर (Level of Management)


ई.एफ.एल.ब्रेच (E.FL. Brech) ने अपनी पुस्तक "Principles and Practice of Management" में

प्रबन्ध के स्तरों को निम्न तीन भागों में विभाजित किया है- 

1. उच्चस्तरीय प्रबन्ध (Top Level Management)
2. मध्यस्तरीय प्रबन्ध (Middle Level Management) 3. निम्नस्तरीय अथवा पर्यवेक्षकीय प्रबन्ध
(Lower Level or Supervisory Management)

1. उच्चस्तरीय प्रबन्ध
.(Top Level Management)

किसी भी उपक्रम में उच्च स्तरीय प्रबन्ध का महत्वपूर्ण स्थान होता है, जो उद्देश्यों एवं नीतियों का निर्धारण करता है। प्रबन्ध के इस स्तर में संचालक मण्डल, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, चेयरपर्सन आदि सम्मिलित रहते हैं। मुख्य कार्यकारी अधिकारी (Chief Executive Officer-CEO) को प्रबन्ध संचालक -(Managing Director) या मुख्य प्रबन्धक (General Manager) आदि नामों से भी पुकारा जाता है। उच्च स्तरीय प्रबन्ध के पास समस्त प्रबन्धकीय अधिकार होते हैं। सी.ई.ओ. जिसे मुख्य अधीशासी भी कहा जाता है, का मुख्य कार्य संचालक मण्डल द्वारा जारी दिशा-निर्देशों एवं नीतियों का पालन करवाना होता है। उपक्रम में संचालित होने वाली समस्त गतिविधियों पर सी.ई.ओ. का ही केन्द्रीय नियंत्रण रहता है। यह संचालक मण्डल तथा अन्य अधिकारियों के मध्य कड़ी का कार्य करता है। इसके कार्यों में उपक्रम में कार्यरत् समस्त कर्मचारियों में समन्वय बनाए रखना, अधीनस्थों के मुख्य कर्तव्यों एवं अधिकारों का बँटवारा करना, कर्मचारियों को प्रेरित कर कार्य स्तर को बनाये रखना आदि शामिल रहते हैं।

 उच्चस्तरीय प्रबन्ध के कार्य (Functions of Top Level Management) 

उच्चस्तरीय प्रबन्ध के अन्तर्गत मुख्य रूप से निम्न कार्यों को सम्मिलित किया जाता है-

(i) उद्देश्यों का निर्धारण- उच्चस्तरीय प्रबन्ध का सबसे पहला एवं महत्वपूर्ण कार्य संस्था के उद्देश्यों को निर्धारित करना होता है। उदाहरण के लिए, कम्पनी की आगामी वर्ष की बिक्री में सुनिश्चित दर से वृद्धि करना, आदि उद्देश्यों को निर्धारित किया जा सकता है।

(ii) नीतियों का निर्धारण- इसके अन्तर्गत नीतियाँ बनाई जाती हैं, जैसे मूल्य को प्रतिस्पद्ध बनाते हुए बिक्री में वृद्धि करना।
(iii)  संसाधनों की व्यवस्था करना- निर्धारित उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिये उच्चस्तरीय प्रबन्ध का कार्य उपक्रम हेतु आवश्यक संसाधनों को जुटाना होता है, जैसे- वित्त की व्यवस्था, कच्चे माल एवं शक्ि के साधनों को उपलब्ध कराना आदि।

(iv) कार्य का निष्पादन करवाना- उच्चस्तरीय प्रबन्ध का एक महत्वपूर्ण कार्य उपक्रम में किये जाते वाले समस्त कार्यों को निष्पादित करवाना है। वैसे यह कार्य मध्यस्तरीय प्रबन्धकों द्वारा करवाया जाता है, किन्तु कार्यों के निष्पादन पर उच्चस्तरीय प्रबन्ध का ही नियन्त्रण रहता है।

(v) उत्तरदायित्वों एवं अधिकारों का बँटवारा- उच्चस्तरीय प्रबन्ध द्वारा इस बात का भी निर्धारण किया जाता है कि अधीनस्थों के उत्तरदायित्व क्या रहेंगे तथा उनके अधिकारों की भी स्पष्ट व्याख्या, उच्च स्तरीय प्रबन्धकों द्वारा ही की जाती है।

(vi) वित्तीय नीति का निर्धारण या बजट पारित करना- उपक्रम की वृहद् वित्तीय नीतियों का निर्धारण भी उच्चस्तरीय प्रबन्ध द्वारा किया जाता है। अधीनस्थों द्वारा प्रस्तुत किये गये बजटों का अन्तिम रूप से अनुमोदन भी प्रबन्ध के इस स्तर द्वारा किया जाता है।

2. मध्यस्तरीय प्रबन्ध (Middle Level Management)

(मध्यस्तरीय प्रबन्ध के अन्तर्गत विभिन्न विभागों के विभागाध्यक्षों एवं उप-विभागाध्यक्षों को सम्मिलित किया जाता है। बड़े उपक्रमों में मध्यस्तरीय प्रबन्ध को भी दो भागों में बाँट दिया जाता है। ये भाग हैं- उच्च मध्यस्तरीय प्रबन्ध तथा निम्न मध्यस्तरीय प्रबन्ध प्रथम श्रेणी में मध्यस्तरीय प्रबन्ध में विभागाध्यक्षों तथा द्वितीय श्रेणी में उपविभागाध्यक्षों को सम्मिलित किया जाता है।
मध्यस्तरीय प्रबन्ध, उच्चस्तरीय प्रबन्ध तथा निम्नस्तरीय प्रबन्ध के मध्य कड़ी का कार्य करता है। एक ओर जहाँ मध्यस्तरीय प्रबन्ध को उच्चस्तरीय प्रबन्ध के निर्देशों तथा नीतियों का पालन करना होता है, वहाँ दूसरी ओर निम्नस्तरीय प्रबन्ध की समस्याओं को हल कर उनके सुझावों को मानने के लिये दबाव का सामना करना पड़ता है। संक्षेप में मध्यस्तरीय प्रबन्ध को निम्नस्तरीय प्रबन्ध से सहयोग प्राप्त कर उच्चस्तरीय प्रबन्ध की नीतियों को अमल में लाने का कठिन कार्य करना पड़ता है।

मध्यस्तरीय प्रबन्ध के कार्य (Functions of Middle Level Management) 

मध्यस्तरीय प्रबन्ध के प्रमुख कार्यों को निम्नानुसार स्पष्ट किया जा सकता है-

(i) नीतियों को लागू करवाना- इस प्रबन्ध स्तर का सबसे महत्वपूर्ण कार्य उच्चस्तरीय प्रबन्ध द्वारा निर्धारित की गई नीतियों की व्याख्या कर उन्हें लागू करवाना होता है, जैसे कच्चे माल के क्रम के सम्बन्ध मैं उच्च गुणवत्ता का ध्यान रखा जाए तथा माल परीक्षण करके क्रय किया जाए, यह बात क्रय प्रबन्धक को अती जाती है।

(ii) सेविवर्गीय सम्बन्धी कार्य - प्रत्येक विभागीय प्रवन्धक को अपने विभाग हेतु योग्य कर्मचारियों की भर्ती, चयन, प्रशिक्षण आदि की व्यवस्था करना होती है।

(iii) निर्देश जारी करना- विभागीय प्रबन्धक अपने विभाग के कर्मचारियों के लिये आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करने का कार्य करते हैं। इसके अतिरिक्त वे अपने अधीनस्थों को आवश्यक संसाधन भी उपलब्ध करवाते हैं।

(iv) अभिप्रेरणा सम्बन्धी कार्य- कर्मचारियों को अपने कार्य (जॉब) के प्रति सन्तुष्टि के लिये उन्हें अभिप्रेरित करते हैं। इसके लिये वे विभिन्न तरीकों को अपनाते हैं।

(v) समन्वय स्थापित करना- मध्य स्तरीय प्रबन्धकों का एक महत्वपूर्ण कार्य विभिन्न उप-विभागों के बीच आपसी तालमेल एवं समन्वय स्थापित करने का होता है, इससे उपक्रम के निर्धारित उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहायता मिलती है।

(vi) सूचनाओं का आदान-प्रदान- यह पहले ही बताया जा चुका है कि मध्यस्तरीय प्रबन्ध उच्चस्तरीय एवं निम्नस्तरीय प्रबन्ध के बीच की कड़ी है, अतः इनका कार्य इन दोनों के मध्य आवश्यक सूचनाओं का आदान-प्रदान करना भी होता है।

(Vii) सुझाव प्रेषित करना अपने अधीनस्थों से प्राप्त सुझावों को उच्चस्तरीय प्रबन्ध को प्रेषित करना ।

(viii) समीक्षा करना- उत्पादन की की समीक्षा करके परिणाम ज्ञात कर उन्हें उच्चस्तरीय प्रबन्ध के पास पहुँचाए जाते हैं।

(3). निम्नस्तरीय अथवा पर्यवेक्षकीय प्रबन्ध(Lower Level or Supervisory Management)

निम्नस्तरीय प्रबन्ध को पर्यवेक्षकीय प्रबन्ध भी कहा जाता है, यह प्रथम पंक्ति का प्रबन्ध होता है, क्योंकि इसमें गैर-प्रबन्धकीय कर्मचरियों से सीधा सम्पर्क रहता है। प्रबन्ध के इस स्तर में मुख्यतः पर्यवेक्षक अथवा कार्यालय प्रमुख आते हैं। इन्हें यह देखना होता है कि कर्मचारियों ने अपना कार्य ठीक प्रकार से किया है अथवा नहीं। इस स्तर के प्रबन्ध के प्रमुख उदाहरण है- उत्पादन विभाग में फोरमेन, विक्रय विभाग में विक्रय अधिकारी, लेखा विभाग में लेखा अधिकारी आदि। इनका मुख्य कार्य मध्य स्तरीय प्रबन्ध की नीतियों एवं निर्देशों को सरल भाषा में कर्मचारियों तक पहुँचाना है। इनकी सबसे बड़ी विशेषता इनका कर्मचारियों तथा श्रमिकों से सीधा एवं जीवित सम्पर्क होना है।

निम्नस्तरीय प्रबन्ध के कार्य (Functions of Lower Level Management) 

निम्नस्तरीय प्रबन्ध के मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं-

(i) कर्मचारियों के लिए उचित वातावरण निर्मित करना- निम्नस्तरीय प्रबन्ध का महत्वपूर्ण कार्य उत्पादन स्थल पर शुद्ध हवा, पीने का पानी, पर्याप्त प्रकाश, स्वच्छता, मित्रतापूर्ण व्यवहार आदि सुनिश्चित करना होता है।

(ii) कर्मचारियों की समस्याओं को प्रेषित करना इस स्तर के प्रबन्ध का सीधा सम्बन्ध श्रमिकों से होता है। इनका कार्य उनकी समस्याओं का समाधान करना होता है। अधिकार क्षेत्रों के बाहर की समस्याओं को ये मध्यस्तरीय प्रबन्ध के पास प्रेषित कर देते हैं।
(iii) कर्मचारियों को कार्य सौंपना- यह प्रबन्ध अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को कार्य सौंपने का कार्य करता है।

(iv) कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना इस स्तर के प्रबन्ध का एक कार्य कर्मचारियों एवं श्रमिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना होता है।
(v) अच्छे मानवीय सम्बन्ध बनाना- पूँजी एवं श्रम के मध्य संघर्ष को टालने के लिए आवश्यक है । श्रमिकों से मधुर सम्बन्ध बनाये रखना। उक्त कार्य निम्नस्तरीय प्रबन्ध के माध्यम से किया जाता है।
(vi) कर्मचारियों के कार्यों का मूल्यांकन करना कर्मचारियों को पि गए कार्यों की पूर्णता के - बाद उनके द्वारा किए गए कार्यों का मूल्यांकन करना भी निम्नस्तरीय प्रबन्ध का कार्य होता है।