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Monday, March 28, 2022

रोकड़ प्रबाह विवरण (Cash flow Statement) का अर्थ।

रोकड़ प्रबाह विवरण (Cash flow Statement) का अर्थ |रोकड़ प्रबाह विवरण बनाने के उद्देश्य और महत्व। 

रोकड़ प्रवाह विवरण से आशय (Meaning of Cash Flow Statement)


रोकड़ प्रबाह विवरण (Cash flow Statement)
Cash Flow Statement


रोकड़ प्रवाह विवरण में व्यवसाय की उन मर्दों को सम्मिलित किया जाता है, जो रोकड़ को प्रभावित करती है। यह रोकड़ के प्रवाह के फलस्वरूप आर्थिक (वित्तीय) स्थिति में परिवर्तन का विवरण है। यह दो स्थिति विवरणों की तिथियों के मध्य रोकड़ शेष में परिवर्तन के कारणों का विश्लेषण करता है। अतः "रोकड़ प्रवाह विवरण एक विशेष अवधि के अन्तर्गत रोकड़ की प्राप्तियों (Receipts) तथा भुगतानों (Payments) का विवरण है।" इसे रोकड़ बहाब विवरण भी कहते है

" रोकड़ प्रवाह विवरण में केवल उन्हीं लेनदेनों को ध्यान में रखा जाता है, जो रोकड़ अन्तर्वाह (Inflow) और बहिर्वाह (Outflow) का सृजन करते हैं, अर्थात् ऐसे लेनदेन जिनसे संस्था की रोकड़ में वृद्धि हो तथा ऐसे लेनदेन जिनसे रोकड़ में कमी हो, को दर्शाता है।


संक्षेप में कहा जा सकता है कि, "रोकड़ प्रवाह विवरण अवधि विशेष के दौरान रोकड़ के स्त्रोतों एवं उनके उपयोग का सारांश है।" रोकड़ प्रवाह विवरण एक उपकरण होता है, जिससे व्यवसाय की तरलता एवं अल्पकालीन शोधन क्षमता का ज्ञान होता है।


रोकड़ प्रवाह विवरण बनाने के उद्देश्य या उपयोगिता या महत्व
(Objects or Utility or Importance of preparing Cash Flow Statement) 


रोकड़ प्रवाह विवरण प्रबंधकों के लिये काफी उपयोगी होता है। इसके बनाने से अल्पावधि के दायित्वों अथवा लेनदारों को भुगतान करने की क्षमता का पता चल जाता है। प्रतिमाह बनाये गये विवरण में इस बात का पता चल जाता है कि किन महीनों में रोकड़ की उपलब्धता अधिक रहती है और किन महीनों के कम रोकड़ प्रवाह विवरण के उद्देश्यों अथवा उपयोगों को निम्न प्रकार बताया जा सकता है

1. अल्पकालीन वित्तीय नियोजन का उपकरण (Tool of Short Term Financial Planning - रोकड़ प्रवाह विवरण व्यवसाय की अल्पकालीन वित्तीय आवश्यकताओं के लिये योजना बनाने में सहायक होता है। इसके द्वारा रोकड़ के स्रोतों तथा उनके उपयोगों की सूचनाएँ उपलब्ध होती हैं। इससे प्रबंधकों को भविष्य के लिये रोकड़ की उपलब्धता का अनुमान लगाने में सहायता मिलती है।

2. उचित शोधन क्षमता के निर्धारण में सहायक (Helpful to Ascertain the Solvency in Better Way) -रोकड़ प्रवाह विवरण से इस बात की सूचना प्राप्त होती है कि व्यवसाय की वास्तविक शोधन क्षमता की स्थिति क्या है ?

3. रोकड़ बजट निर्माण में सहायक (Helpful in preparing the Cash Budget)- रोकड़ प्रवाह विवरण भविष्य की अवधि के लिये भी तैयार किया जा सकता है। इससे भविष्य हेतु रोकड़ का बजट निर्माण करने में सहायता मिलती है। प्रबंधकों को इस बात का अनुमान लगाने में सहायता मिलती है कि किन अवधियों में रोकड़ की प्राप्तियाँ अधिक होगी एवं किन महीनों में कम।

4. रोकड़ प्रवाह की प्रवृत्ति का ज्ञान (Knowledge of the Trend of The Cash Flow) रोकड़ प्रवाह विवरण बनाने से रोकड़ की प्रवृत्ति या झुकाब की स्थिति का पता चल जाता है। इसके साथ विनियोग एवं वित्तीय क्रियाओं में रोकड़ के उपयोग का भी ज्ञान प्राप्त हो जाता है।

5. व्यवसाय की प्रगति की जानकारी (Knowledge of Progress of Business)- संचालन क्रियाओं से यदि व्यवसाय की आय में वृद्धि होती है तो यह व्यवसाय की प्रगति का सूचक माना जाता है। इसके विपरीत आय अर्थात् रोकड़ में कमी इस बात का परिचायक है कि कम्पनी अच्छे लाभ अर्जन की स्थिति में नहीं है।


Monday, March 14, 2022

MPTET EXAMS | Samvida varg 1 2 3 | Child development | बाल विकास

MPTET EXAMS | Samvida varg 3 | Child development | बाल विकास  



बाल विकास (Child development)

बाल मनोविज्ञान का सर्वप्रथम अध्ययन जॉन लाक (सीधा अध्ययन) ने किया था । 

बाल मनोविज्ञान को  सर्वप्रथम परिभाषित बर्क (अमेरिकन मनोवैज्ञानिक ) ने किया था।


पेस्टालॉजी

* बाल ने मनोविज्ञान का सबसे पहले वैज्ञानिक अध्ययन  किया |

*1.5 वर्ष के बालक पर ( व्यवहार का ) अध्ययन किया।

 * इन्होंने बालक के अध्ययन पर पुस्तक Baby biography लिखी।

बाल मनोविज्ञान के  जनक

स्टेनले हॉल - इन्होंने सबसे पहले प्रश्नावली का निर्माण किया इनको बाल मनोविज्ञान का जनक कहा जाता है। 


बाल मनोविज्ञान की परिभाषा

0-18 वर्ष (गर्भावस्था से किशोरावस्था) तक के  बालकों का अध्ययन जिस शाखा में किया जाता है उसे बाल मनोविज्ञान कहते हैं।


क्रो एण्ड को के अनुसार "१०वीं शताब्दी का काल बालकों का काल है"।


विश्व का पहला बाल सुधार गृह न्यूयार्क (USA) (1887)


एण्डरसन के अनुसार “ विकास का अर्थ मात्र किसी व्यक्ति की ऊँचाई या योग्यता में कुछ वृद्धि से नहीं है। इसके स्थान पर विकास अनेक संरचनाओं और प्रकार्यों के समन्ना की एक जटिल प्रक्रिया है।"


हरलॉक के अनुसार विकास का अर्थ गुणात्मक परिवर्तनों से है विकास की परिभाषा क्रमिक, सम्बन्धतापूर्ण, परिवर्तनों की प्रगतिपूर्ण श्रृंखला के रूप में दी जा सकती है


विकास की विशेषतायें, 

* विकास प्रगतिपूर्ण श्रृंखला के रूप में घटित होता है। *विकास में कमिक परिवर्तन पाये जाते है। 

*परिवर्तनो में निरन्तरता पाई जाती है।

* यह परिवर्तन अविराम गति से चलते हैं। 

* विकास किसी भी अवस्था में सामान्य नहीं होता है।

*क्रमिक परिवर्तन एक दूसरे के साथ किसी न किसी रूप से सम्बन्धित रहते हैं। यह परिवर्तन एक दुसरे से अलग न होकर जुड़े रहते हैं।

* विकास परिवर्तनों की गति भिन्न  अवस्थाओं में भिन्न-2 होती है। 


विकास के स्वरूप

आकार में परिवर्तन- यह परिवर्तन विशेष रूप से शारीरिक वृद्धि में दिखाई देते है जैसे बालक बड़ा होता जाता है उसकी ऊं. भार, मोटाई में अंतर आ जाता है। मानसिक विकास के अन्तर्गत शब्द भंडार तर्क और स्मरण शक्ति में क्रमश: विकास दिखाई देता है


अनुपात में परिवर्तन-बालक के सभी शारीरिक अंग समान रूप से नहीं बढ़ते अन्य अंगों के अनुपात में नवजात शिशु का सिर अनुपात में बड़ा होता है किंतु जैसे जैसे शिशु वढता है उसका सिर सम्पूर्ण शरीर के अनुपात में अपेक्षाकृत कम बढ़ता है। है| पुराना विशेषताओं का लोप पुराने अंग लुप्त होना प्रारम्भ हो जाता है। 

नई विशेषताओं की प्राप्ति - पुरानी विशेषताओं के समाप्त होने के साथ- साथ नई शारीरिक, मानसिक विशेषताओं की प्राप्ति होती है। ६५० - स्थायी दांत मानसिक विकास - यौन सम्बन्धित ज्ञान की जिज्ञासा, नैतिकता, धार्मिकता आदि ।


विकास के सिद्धांत - व्यक्तिगत विभिन्नता का सिद्धांत - प्रत्येक बालक का शारीरिक एवं मानसिक विकास व्यक्तिगत रूप से भिन्न होता है। इसलिए समान आयु के बालक बालिकाओं में शारीरिक, मानसिक और सामाजिक  विकास में भिन्नता दिखाई देती है।

अंतर समान प्रतिमान का सिद्धांत - प्राणी जगत में प्रत्येक  जाति के विकास का एक निश्चित नियम होता है 

हरलॉक के अनुसार " प्रत्येक प्रजाति वह चाहे मनुष्य जाति हो या पशु जाति हो अपनी प्रजाति के अनुरूप विकास का अनुसरण करते हैं।"

Wednesday, March 2, 2022

इकहरा लेखा प्रणाली (Single Entry System of Accounting) का अर्थ | विशेषता | महत्त्व।

इकहरा लेखा प्रणाली (Single Entry System of Accounting) का अर्थ | विशेषता | महत्त्व। 

इकहरा लेखा प्रणाली का अर्थ (Meaning of Single Entry System of Accounting)

इकहरा लेखा प्रणाली


बहीखाता रखने की वह प्रणाली जिसमें दोहरा लेखा प्रणाली के सिद्धान्तों का पूर्णतः पालन नहीं किया जाता है, उसे इकहरा लेखा प्रणाली कहते हैं। इस प्रणाली में किसी व्यवहार का लेखा सामान्यतः एक ही पक्ष में होता है, अतः इसे अपूर्ण लेखा प्रणाली और एकांगी प्रविष्टि प्रणाली भी कहते हैं। 

इकहरा लेखा प्रणाली की परिभाषा

जे.आर. बॉटलीबॉय के अनुसार, "इकहरा लेखा प्रणाली बहीखाता की वह प्रणाली है। जिसमें देनदार तथा लेनदार के केवल व्यक्तिगत खाते रखे जाते हैं।" इसे निम्नानुसार भी परिभाषित किया जा सकता है

"इकहरा लेखा प्रणाली बहीखाते की वह प्रणाली है, जिसमें कुछ सौदों के दोनों पहलुओं का लेखा किया जाता है, जबकि कुछ सौदों के केवल एक पहलू का तथा कुछ सौदों का लेखा नहीं किया जाता है। प्रायः इस प्रणाली में व्यक्तिगत एवं रोकड़ से सम्बन्धित व्यवहारों का ही लेखा किया जाता है।"

इकहरा लेखा प्रणाली की विशेषताएँ।
(Characteristics of Single Entry System) 

1. सीमित क्षेत्र- इस प्रणाली को केवल छोटे व्यवसायी ही अपनाते हैं। कानूनी बाध्यता होने से कम्पनी संगठनों द्वारा इस प्रणाली को नहीं अपनाया जा सकता है। 

2. अपूर्ण लेखा- इस प्रणाली में व्यवहारों का अपूर्ण लेखा रखा जाता है।

3. रोकड़ एवं व्यक्तिगत व्यवहारों का लेखा- इस प्रणाली में रोकड़ एवं व्यक्तियों तथा संस्थानों से सम्बन्धित व्यवहारों का ही लेखा रखा जाता है। नाममात्र (Nominal) एवं वास्तविक खाते को महत्व नहीं दिया जाता है।

4. मूल-अभिलेख आवश्यक- इसमें कुछ व्यवहारों का लेखा नहीं होने से सूचना एवं जानकारी के लिये मूल-अभिलेख या प्रमाणकों को सुरक्षित रखना आवश्यक होता है। 

5. सहायक बहियाँ रखना- इस प्रणाली में दोहरा लेखा प्रणाली की तरह सहायक बहियाँ रखी जा सकती हैं, परन्तु उनमें खतौनी केवल व्यक्तिगत खातों की तरह की जाती है।

6. छोटे व्यवसाय के लिये उपयोगी यह प्रणाली छोटे जैसे- किराना व्यापारी, कविता, एकाकी व्यापार आदि के लिये उपयोगी है। 

7. सम्पत्तियों के खाते नहीं खोलना इस प्रणाली में सम्पत्तियों से सम्बन्धित खाते नहीं रखे जाते हैं। इकहरा


इकहरा लेखा प्रणाली के लाभ या उपयोग (Advantages or utility of Single Entry System) 

1. सरल एवं सुविधाजनक- यह प्रणाली सरल एवं सुविधाजनक है, क्योंकि इसमें दोहरा लेखा प्रणाली की तरह सौदों के दोनों पहलुओं का लेखा नहीं करना पड़ता है। 

2. मितव्ययी- यह प्रणाली कम खर्चीली है, क्योंकि इसमें अपेक्षाकृत कम पुस्तकें रखी जाती है तथा लेखाकार की नियुक्ति आवश्यक नहीं होती है।

3. छोटे व्यवसायों के लिये उपयोगी - प्रायः इस प्रणाली को छोटे व्यवसायी एवं फर्म के द्वारा अपनाया जाता है, जहाँ कम एवं नकद व्यवहार ही होते हैं। 

4. व्यावहारिक- यह प्रणाली छोटे स्तर के व्यवसाय के लिये व्यावहारिक है, क्योंकि इसके द्वारा लाभ-हानि ज्ञात कर अपने उद्देश्यों की पूर्ति आसानी से कर ली जाती है।

5. कम आय प्रकट करना- अपूर्ण लेखों के रखने से कई सौदों या व्यवहारों से प्राप्त आय को लिया जाता है एवं लाभ कम दर्शाने से आयकर आदि से बचा जा सकता है। 6. समय एवं श्रम की बचत प्रायः इसमें अपेक्षाकृत लेखा कार्य कम किया जाता है, जिससे समय एवं श्रम की बचत हो जाती है।

7. प्रशिक्षित व्यक्ति की आवश्यकता नहीं- इस प्रणाली में दोहरा लेखा प्रणाली की तरह जटिल नियम एवं सिद्धान्त नहीं होते हैं। केवल कुछ ही खातों को खोलकर काम चला लिया जाता है। अतः इसमें प्रशिक्षित लेखाकार की आवश्यकता नहीं होती है।

8. व्यवसायी को लाभ- अपूर्ण लेखा प्रणाली में कई ऐसे तथ्यों को छुपा लिया जाता है, जिनके प्रकट होने से व्यवसायी के ऊपर व्यय भार बढ़ जाता है। इससे व्यवसायी कई प्रकार के करों या व्ययों को। बुकाने से बच जाता है।

इकहरा लेखा प्रणाली के दोष या सीमाएँ (Disadvantages or Limitations of Single Entry System)

इकहरा लेखा प्रणाली को अवैज्ञानिक एवं अविश्वसनीय माना गया है, इसी कारण वर्तमान में इस प्रणाली का प्रयोग कम किया जाने लगा है। इसके प्रमुख दोष या सीमाएँ निम्नानुसार हैं 
1. सीमित क्षेत्र- इस प्रणाली को केवल छोटे स्तर के व्यापारी एवं फर्मों के द्वारा ही अपनाया जाता है। बड़े स्तर के व्यवसाय एवं कम्पनी संगठन के लिये यह प्रणाली उपयोगी नहीं है। 

2. गणितीय शुद्धता का अभाव- इस प्रणाली के अनुसार तलपट नहीं बनाया जा सकता, अतः गणितीय अशुद्धि रहने की संभावना बनी रहती है।

3. अवैज्ञानिक- यह प्रणाली किन्हीं निश्चित नियमों एवं सिद्धान्तों पर आधारित नहीं है। 

4. अविश्वसनीय इस प्रणाली में कई तथ्यों को छुपा लिया जाता है। इससे इसके उपयोगकर्ता प्रकट की गई सूचनाओं पर विश्वास नहीं करते हैं। 

5. सही आर्थिक परिणामों का अभाव- इस प्रणाली के अनुसार केवल रोकड़ एवं व्यक्तिगत खातों को रखा जाता है। नाममात्र एवं वास्तविक खातों के अभाव में लाभ-हानि खाता तथा शुद्ध स्थिति विवरण नहीं बनाया जा सकता।

6. अशुद्धियों का सुधार न होना- दोहरा लेखा प्रणाली की भाँति इसमें अशुद्धियों के सुधार का कोई प्रावधान नहीं है। 

7. तुलनात्मक अध्ययन संभव नहीं- लेखों के अपूर्ण होने से पिछले वर्षों के वित्तीय परिणामों से तुलना करने में कठिनाई होती है।